दिली के तुगलकाबाद में हुए हादसे ने पुरे देश का ध्यान खीचा क्योकि सड़क पर दो वाहन सवार के गाड़ी आपसे में टकराये जिससे सम्भवतः एक वाहन में खरोच आगयी और इस मामूली से घटना के बाद एक वाहन चालक ने दूसरे को जान से मार डाला मैंने इस खबर को देखते हुए सोचा कैसा होगा वो आदमी जो इतनी सीे बात के लिए एक आदमी की जान लेली ।
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> इस खबर को दीखाते हुए मीडिया ने यह भी दीखाया की वहा पुलिस मौजूद थी और उसने बचाने का कोई प्र्यास नही किया वो मूक दर्शक की तरह देखता रहा । तब इस खबर को देखकर मैंने ये प्रतिक्रीया दी थी की नही गलती पुलिस की नही हम नागरिको की है जो सब कुछ पुलिस पे छोड़ देते है। जिस आदमी ने ये घटना को आजम दिया होगा वो पहले भी सड़क पे वाहन पे चलते हुए दूसरे वाहन चालक से अभद्रता करता होगा या मारपीट भी लेकिन किसी ने शिकायत उसके खिलाफ नही की होगी क्योकि हम भारतीयो की मानसिकता होती है की हम गलत होता देख कहते है की इसका भी कोई बाप मिलेगा वो इसको सूधार देगा और अनदेखा कर चल देते है जिससे इसतरह के हिंसक लोगो का मनोबल बढ़ता रहता है। और किसी दिन गाली गलौज और मारपीट की मामूली घटना में किसी की मोत तक हो जाती है क्योकि उसको पहले बार ही सबक क़ानूनी तोर पे नही सिखाया गया।
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> इन सारे घटना के बीच आज मेरे ऑफिस के सहयोगी ने बताया की आज जब वो ऑफिस अपनी कार से आ रहे थे तब अहिंसा सर्किल से ही उन्होंने अपनी कार का इंडिकेटर दे रखा था और वो आराम से जब मुड़े तो एक आदमी ने गाड़ी तेजी से घुसा दिया और उलटे सीधे गाली निकालने लगा वो बोले की मैं अचंभित था की कोई व्यक्ति गलती करने के बाद खुद गाली कैसे निकाल सकता है मैंने उनसे तुरंत पूछा की फिर आपने क्या किया तो उनका जबाब था की कुछ नही में चुप चाप ऑफिस आगया। मैंने उनसे कहा की आप जैसे लोग दोषी है तुगलकाबाद जैसे घटना के लिए क्योकि मेंरा मानना है किसी की गलती को अंदेखा करना उसको और बड़ी गलती करने के लिए प्रोत्साहित करना है ।
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> लेकिन मुझे क्या पता था की आज ही के दिन इसतरह के घटना से मुझे ही रूबरू होना पड़ेगा और आज मेरे लिए भी एक परिछा की घडी थी क्योकि मेरे द्वारा सुबह में मेरे ऑफिस के सहयोगी को दिया गया उपद्देश को ज़मीन पे लाने का समय आ चूका था हुआ यूं की मै अपने भाई के साथ जयपुर के सीकर रोड के रीलैन्से मार्केट से घर का सामान लेकर रात के लगभग 9.30 बजे घर के लिए निकला और 200 मीटर आगे बढ़ा होगा की एक tata maxi ने आगे से overtak करके गाड़ी हमारे आगे लगा दी जब हम साइड लेकर उसके बराबरी पे पहुचे और उससे कुछ पूछते की ड्राईवर के बगल में बैठा व्यक्ति गालिया निकालने लगा फिर हमन उन दोनों की आखे देखी तो लाल थी मैंने तुरन्त अपने भाई को बोला 100 नंबर पे लगाओ तब वो भागने लगा और हम पीछा करने लगे इस क्रम में उसने दो बार अपनी गाड़ी से दबाने की कोसिस की हम फिर भी लगे रहे इतने में VKI रोड नंबर 1 का लाइट आ गया जहा एक ट्रैफिक पुलिस का बूथ भी लगा है हम उस बूथ पर गए और बोला की ये गाड़ी पकड़ो लेकिन उसने कुछ नही किया लेकिन वो गाड़ी वाला डर कर पीछे मुड़ाकर भाग गया फिर मैंने देखा की अब मैं उसका पीछा नही कर सकता पुलिस वाला कर सकता है और मैंने पुलिस वाले को बोला की आप नाकाबंदी करके गाड़ी वाले को पकड़ो क्योकि वो नसे में है और उसकी गाड़ी से कोई मर भी सकता है फिर उस पुलिस वाले की आवाज लडखडाती हुयी आयी और जब मैंने उसको नजदीक जाके देखा तो वो सराब के नसे में था जब मैं उसकी फ़ोटो लेने लगा तो वो खड़ा होगया लड़ने के लिये मैंने सोचा अब थाने चलते है और विद्याधरनगर थाने पहुँचा वहा घुसते ही एक दरोगा साहब जिनका नाम हनुमान था वो सो कर TV पे सिनेमा देख रहे थे उन्हें आप बीती बताई तो सोते सोते पूछा कहा चोट लगी है दीखाओ मैंने कहा चोट नही लगी बच गया में फिर बोले फिर क्या समस्या है मैंने कहा समस्या ये है की वो सराबी ड्राईवर अभी भी नसे में गाड़ी दौड़ा रहा है कोई अनहोनी हो सकती है आप हमारी शिकायत दर्ज करो तब उन्होंने सोते सोते ही सिपाही को बोला इनका नाम पता लिख लो मैंने कहा की अजी मुझे थोड़ी न पकड़ना है उस गाड़ी का पहले नंबर लिखो और नाकाबंदी करवाकर पकड़ो नही तो कोई दुर्घटना घट जायेगी उन्होंने फिर जाकर उस गाड़ी नंबर RJ23 GA 8357 नोट किया मैंने कहा उसे पकड़कर मुझे बुलाना में कोर्ट तक उसके खिलाफ गवाही दूंगा जिससे दुबारा इसतरह की घटना को अंजाम न दे पाये और में घर आगया तब बनिपार्क के दुर्घटना थाने से फ़ोन (0141-2209040) आया आपने 100 नंबर पे कॉल किया था मैंने बोला हा किया था कहा चोट लगी मैंने कहा नही लगी फिर बोलते है की आप अपना नाम पता बताओ मैंने बता दिया उसने मेरी जात तक पूछ ली लेकिन उस सराबी के द्वारा चलायी जा रही गाड़ी के बारे में कुछ नही पूछा मैंने अंत में बोला की आप गाड़ी पकड़ो बोलते है की अभी नाकाबंधी करवाकर पकड़वा रहा हु मैंने बोला की गाड़ी नंबर तो नोट करले इतना कहना था की उन्होंने फ़ोन काट दिया।
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> और एक घटना ने मेरी सोच ही बदल दी जहाँ सुबह तक में ये कह रहा था की तुगलकाबाद की घटना के लिए हम सब जिमेदार है पुलिस नही लेकिन मेरे साथ जब घटना हुयी मै पुलिस के पास गया तो वो पुलिस वाला खुद नसे में था थाने में गया तो हनुमान जी दरोगा उठे तक नही तो इसतरह की घटना और होगी खूब होगी क्योकि जिस पुलिस का स्लोगन है " अपराधियो में भय आमजनों में विस्वास" इसे पढ़ने के बाद मै ये नही समझ प् रहा हु की क्या मै आमजन नही हु ? उस सराबी पुलिस और सराबी ड्राईवर में से किसका अपराध बड़ा है ? सायद इन प्रश्नो का उत्तर न मिले लेकिन मुझे इतने निरासा हाथ लगने के बाद भी एक बात की खुशि है की मैंने अपना सजग नागरिक होने का फर्ज अदा किया क्योकि अभी हाल में ही नोबेल पुरुस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने पुरुस्कार प्राप्त करते समय जो भासण दिया था उसमे एक कहानी सुनायी थी की एक बार जंगल में आग लग गयी सभी भाग रहे थे और जंगल का राजा कहे जाने वाला शेर भी भाग रहा था उसने एक चिड़िया को देखा वो जंगल में जा रहा था उस शेर ने चिड़िया से पूछा तुम कहा जा रहे हो चिड़िया बोली आग बुझाने जा रही हु मुँह में पानी ले रखा है। कहानी ये थी की आप अपना दायित्व निभाईये अपने हिसे की बाकि क्या होगा इसपे ध्यान न दे।
Thursday, 9 April 2015
शाम होते होते मेरी सोच बदल गयी
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