Thursday, 8 January 2015

भारतीय मीडिया की गिरती साख

किसी भी लोकतंत्र में मीडिया का अहम योगदान होता है क्योकि मीडिया समाज का आईना होता है और वो देश में होने वाले किसी भी घटना पे अपनी स्वतंत्र राय रखता है। लेकिन भारतीय लोकतंत्र में कुछ दिनों से ये देखने में नही आरहा है जो देश के लिए ठीक नही है। क्योकि जिस प्रकार से देश में घोटालो की मैराथन सुरु हुई तो न्यायपालिका के साथ साथ मीडिया की भूमिका बढ़ने लगी लेकिन हमारे देश हुआ ये की मीडिया हाउस के मालिक कई घोटालो  के आरोपी मालिक बन बैठे कोयला घोटाले के अनेक आरोपी मीडिया हाउस के या तो मालिक बन गए या फिर कुछ हिसेदारी लेली इसका परिणाम ये हुआ की मीडिया हाउस सत्ता की चाटुकार होती जा रही है। और फिर वो मीडिया आम आदमी पार्टी के चुनावों के लिए ईमानदारी से चंदा इकठा करने के तरीके पे सवाल तो उठती है की 20000 के आम आदमी खाना कैसे खा सकता है लेकिन वो बीजेपी कांग्रेस के 80% चंदे का स्रोत नही बताने पे मोन रहती है। ये मीडिया मोदीजी से ये सवाल नही पूछ पाती की आपने कहा की न खाऊंगा न खाने दूंगा लेकिन 2G /4G गैस घोटाले के आरोपी कंपनी के वकील आपके मंत्रिमंडल में है। वो वकील अपने पुराने ग्राहक को फायदा नही पंहुचा सकता है क्या ? ये मीडिया ये सवाल नही पूछ पाता है मोदी सरकार से की न्यूक्लियर डील के समय वामपंथियो के समर्थन वापस लेने से UPA सरकार अल्पमत में आने पे लोकसभा में बीजेपी के कुछ सांसद ने 1 करोड़ के नोट लहराते हुये आरोप लगाया था की ये UPA के लोग ने दिया था वोट के लिए बाद में बीजेपी सांसद और अमर सिंह जेल भी गए और सभी आरोपी बरी होगये वो पैसा 1 करोड़ किसका था आज तक दिली पुलिस पता नही कर पायी क्यों नही मोदी सरकार पता करवाती है काला धन न सही यही पैसा पता करके बता देवे की किसका पैसा था लेकिन सता और मीडिया के साथ साठ गांठ होने कारण इसे भूलना पड़ा क्या यही स्वतन्त्र निर्भीक मीडिया का कार्य है ? इसे सत्ता की चटूकारित न कहे तो क्या कहे ? मोदी सरकार ने कहा था एक साल के अंदर संसद को सुध करेगे लेकिन हुआ क्या पिछले 7 महीनो में ? अगले 5 महीनो में हमारे 34 % संसद या तो सजा पा जायेगे या बरी हो जायेगे क्या ? ऐसा लगता है आपको ? लेकिन मीडिया इस मत्वपूर्ण बीजेपी के वादे को याद भी नही दिला रही है न ही बीजेपी को न ही देशवासियो को क्या यही चौथे स्तम्भ का कार्य है ? मीडिया आम आदमी पार्टी के द्वारा पानी पे छुट देने की आलोचना करती है लेकिन वही मीडिया देश 92 सांसद पिछले सात महीने से दिली के पांच सितारा होटल में रह रहे है जिसका एक दिन का खर्चा 8 लाख वो किसका पैसा है और किसके लिए है ? इस देश में घोटाले से कितना नुकसान हो रहा है कर्नाटक के लोकायुक्त रहे सन्तोस हेगड़े ने अपनी रिपोर्ट में दिया की कंपनियो ने जितनी खनन का लाइसेंस लिया था उससे ज्यादा का खनन किया जिससे सीधे सरकार को 5000 करोड़ का नुकसान हुआ क्या इन घोटालो से देश का वित्तीय घाटा नही बढ़ता बस जनता के कल्याणकारी योजनाओ से ही वितीय घाटा बढ़ता है जो कच्चे तेल के दाम आधे हो गए लेकिन ये सरकार ने रैट पेट्रोल डीज़ल के आधे नही किये और टैक्स बढा दिए क्या इसपे मीडिया का रुख देश की जनता के तरफ न होकर सत्ता की चाटुकार नजर आई क्योकि इस फैसले की आलोचना होनी चाहीये थी लेकिन हुआ नही और सरकार की घिसी पिटी दलील के हाँ में हाँ मिलाती नजर आयी । होना ये चाहीये था की भर्स्टर व्वस्था के रहते जनकल्याणकारी योजना का पूरा पैसा जनता तक कैसे पहुचेगा ? ये सवाल किसी मीडिया के द्वारा नही हुआ क्या यही रूप होता है स्वतन्त्र निर्भीक बेबाक मीडिया का क्या ? और अगर ऐसा ही होता है तो फिर ये रूप हमारे देश के मीडिया का नही होना चाहिये।
तीन काले धन रखने वाले के नाम सर्वाजनिक हुए जिसमे से दो ने दोनों पार्टी को चंदा दे रखा था लेकिन इस देश का मीडिया को इस खबर को जिस प्रमुखता से दीखना छापना चाहीये था वैसा हुआ नही।